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अपने तन और मन की बनावट को जानें और अपनी पहचान करें।
अपने तन और मन की बनावट को जानें और अपनी पहचान करें।
Submitted On :
Feb 07, 2016
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5015
By :
Parijat sanchetna
Comments :
ड्रीम द्वारका सीरीज- 1

अपने तन और मन की बनावट को जानें और अपनी पहचान करें।

क्या आप खुद को जानते हैं ?

ये माना कि आपको अपना नाम पता है, अपने खानदान के बारे में जानते हैं लेकिन क्या आपने कभी खुद अपने शरीर की पहचान की है, अपने स्वभाव के बारे में जानकारियां जुटायी हैं ? आपकी प्रकृति क्या है यह जानते हैं ?

यदि हां तो बड़ी अच्छी बात है । लेकिन यदि नहीं की तो अब भी देर नहीं हुई है। अपनी पहचान खुद कीजिए और अपने बारे में जानकर अपनी समस्याओं के निदान के लिए खुद प्रयास कीजिए।

सनातन भारतीय परंपरा में आयुर्वेद स्वास्थ्य रक्षा के लिए सबसे महत्वपूर्ण ग्रंथ है। मानव शरीर की बनावट और स्वभाव निर्धारण के बारे में इस पर विस्तार से चर्चा की गयी है। आयुर्वेद के अंतर्गत प्राकृतिक चिकित्सा विधि में मानव को अपनी प्रकृति की पहचान करने के लिए का गया है।

आप एक सजग व्यक्ति हैं तो अपने रंग रूप, बनावट, गठन और स्वभाव का सावधानी से निरीक्षण दीजिए। आयुर्वेद के अनुसार गर्भा वस्था में ही हर व्यक्ति की प्राकृतिक बनावट, उसके रंग रूप और प्रकृति का निर्धारण हो जाता है।

त्रिदोष को जानें

दोष शब्द का अर्थ गुण समझिए। यहां दोष का मतलब किसी बुराई या बीमारी से नहीं है। इन गुणों के आधार पर किसी व्यक्ति की प्रकृति तय होती है।

आयुर्वेदिक ग्रंथों में वात, पित्त और कफ त्रिदोष माने गए हैं। इन तीनों के सम अवस्था में रहने से शरीर स्वस्थ रहता है। हर व्यक्ति का शरीर आम-तौर पर किसी एक या दो दोषों से प्रभावित होता है। कुछ लोगों में तीन दोषों की समस्या एक साथ हो सकती है। लेकिन यदि व्यक्ति अपनी प्रकृति की पहचान ठीक से कर ले तो स्वस्थ जीवन शैली फिर से अपनाकर अपने दोष का उपचार खुद कर सकता है। स्वस्थ जीवन शैली के सहारे अपनी अंतिम सांस तक पूरी तरह स्वस्थ रह सकता है।

इन ग्रंथों में व्यक्ति की प्रकृति मुख्य रूप से सात तरह की बतायी गयी है। आप अपने लक्षणों को पहचान कर इन सात में से किस प्रकृति के हैं, यह आसानी से जान सकते हे। और एक बार जब आप अपनी प्रकृति जान जाते हैं तो आपकी आधी समस्या हल हो जाती है। अब सात तरह की प्रकृतियों के बारे में जानें।

1. वातिक प्रकृति 2. पैत्तिक प्रकृति
3. कफज प्रकृति 4. त्रिदोषज प्रकृति
5. पित्त वातज प्रकृति 6. वात कफज प्रकृति
7. कफ पैत्तिक प्रकृति

1. वातिक प्रकृतिः
वातिक प्रकृति के लोग आम-तौर पर वायु विकार से अधिक ग्रस्त होते हैं। इन्हें ठंड अधिक लगती है और सर्दी बर्दाश्त नहीं होती। शरीर की नसें / शिराएं उभरी हुई होती हैं। हाथ-पैर फटने की शिकायत रहती है। चंचल आंखें, अस्थिर बुद्धि, दुबला-पतला शरीर, तेज चलना, और जल्दी-जल्दी बोलना इनका स्वभाव होता है। नाखून, दाढ़ी और बाल रूखे होते हैं। गाना सुनना और खुद गाना अच्छा लगता है, क्रोध अधिक आता है। क्रोध आने पर बिना सोचे विचारे लड़ाई / हिंसा पर उतारू हो जाते हैं।

वातिक प्रकृति के लोगों को ज्ञान मुद्रा का उपयोग हमेशा करना चाहिए। इससे पकी अधिकांश समस्याओं का समाधान हो सकता है। यह सरल उपाय अभी आजमाएं । अपने अंगूठे और अंगूठे के साथ वाली उंगली यानी तर्जनी के उपरी छोर को एक साथ मिलाकर रखें। यह ज्ञान मुद्रा कहलाती है। अपने शरीर में वायु को नियंत्रित रखने का यह सबसे अच्छा उपाय है। यह मुद्रा तन के साथ मन को नियंत्रित करने में काफी सहायक है। इसके साथ ही आप किसी अच्छे योगी या प्राकृतिक चिकित्सक से संपर्क करें। उनके साहचर्य में आपकी सभी समस्याओं का निदान हो जाएगा।

2. पैत्तिक प्रकृतिः

पैत्तकि प्रकृति के लोग आमतौर पर बड़ी जल्दी नाराज़ हो जाते हैं और जितनी जल्दी नाराज होते हैं उससे भी जल्दी खुश हो जाते हैं। ऐसे लोग बड़े तेजस्वी, प्रभावशाली वक्ता और अपनी बात मनवाने वाले होते हैं।

पित्त की अधिकता से ग्रस्त लोगों के तन से दुर्गंध आना, अधिक पसीने आना, अधिक भोजन करना, गोल-मटोल होना, मुंह की बीमारियों से परेशान रहना (मसलन मुंह में छाले आना, दांत / मसूड़ों में तकलीफ आदि), आंख, जीभ, होंठ, तालू, नाखून, हथेली और तलवा तांबई रंग का होना इनके समान्य लक्षण हैं। इन्हें गर्मी बिल्कुल बर्दाश्त नहीं होती । यह अक्सर मौसम की शिकायत करते मिलेंगे।

3. कफज प्रकृतिः

कफज प्रकृति के लोगों का शरीर आम-तौर पर सुंदर सुडौल मध्यम आकार का होता है। यह सामान्यतया नीरोग , कृतज्ञ और सहनशील होते हैं। मगर किसी से दुश्मनी हो जाए तो अंत तक संघर्ष करते हैं। ये कफ विकार से अधिक ग्रस्त होते हैं क्योंकि इनके शरीर में कफ का निर्माण अधिक होता है। कफ पर नियंत्रण रखने के लिए हर मौसम में खान पान पर ध्यान देने की साथ वस्त्रों का चुनाव सावधानी से करने की जरूरत होती है।

4. त्रिदोषज प्रकृतिः

पित्त, वायु और कफ तीनों की अधिकता वाले लोग त्रिदोषज प्रकृति वाले कहे जाते हैं। इन्हें अपना ध्यान अधिक रखने की आवश्यकता होती है। बदलते मौसम में आपको अनेक तरह की समस्याओं का सामना करना पड़ सकता है।

5. पित्त वातज प्रकृतिः

वात और पित्त की अधिकता वाले लोग इस श्रेणी में आते हैं।

6. वात कफज प्रकृतिः

कफ और वात की अधिकता वाले लोग इस श्रेणी में आते हैं।

7. कफ पैत्तिक प्रकृतिः

जब कफ और पित्त दोनों की अधिकता हो तो ऐसे व्यक्ति इस श्रेणी में रखे जाते है।

जिस तरह व्यक्ति की प्रकृति होती है उसी तरह आहार रूप में जिस फल, सब्जी या अनाज का उपयोग करते हैं उनकी भी प्रकृति होती है। आयुर्वेदिक ग्रंथों में आहार की प्रकृति का भी निर्धारण किया गया है।
आप की प्रकृति जिस तरह की है उसी अनुकूल आहार आप लेंगे तो बीमारी आप से हमेंशा दूर रहेगी।

यदि कोई व्यक्ति कफज प्रकृति का हो तो उसके आहार में कफ बढा़ने वाले खाद्य पद्धार्थ मसलन अरबी, भिंडी, राजमा, दही की मात्रा कम होनी चाहिए। जाने-अनजाने इनका सेवन अधिक करने से शरीर में कफ की समस्या बढ़ेगी जबकि यही आहार पित्तज प्रकृति वाले व्यक्ति के लिए नुकसान देह नहीं होगा।


यदि आप अपने खान-पान, आहार-व्यहार पर ध्यान रखेंगे तो आपके शरीर में कफ वायु और पित्त तीनों का संतुलन बना रहेगा और आप कभी बीमार नहीं होएंगे।
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